Saturday, January 16, 2010

भरत, भारत और भारतीय

संस्‍कृत के महान कवि कालिदास ने अपने 'अभिज्ञानशाकुंतलम' में लिखा है कि विश्‍वामित्र, ऋषि या मुनि तपस्‍या कर रहा थ, उसने मेनका स्त्री को देखा और तप छोड कर 'काम' के चक्‍कर में पड गया, एक लडकी को जन्‍म दिया, उसे वन में छोड कर दोनों भाग गए, जैसे आज लडकियों से पीछा छुडाने के लिए कहीं भी छोड देते हैं, यह प्राचीन भारतीय परंपरा है
कण्‍व ऋषि करूणावश उस लडकी को पालता है और उसे शकुंतला नाम देता है, जब कण्‍व कहीं गया हुआ था तब महान राजा दुष्‍यंत ने आश्रम में प्रवेश किया और उस लडकी के साथ विश्‍वामित्र-मेनका वाली सारी कामक्रिया दोहरा दी, ध्‍यान रहे यह सब आश्रम में हुआ, कण्‍व जब आश्रम में वापस आता है तो वह इस सब के लिए किसी को भलाबुरा नहीं कहता, क्‍योंकि जिसने यह सब किया वह समर्थ है, वह राजा है, अतः कण्‍व ऋषि कहता हैः
'वत्‍से, दिष्‍ट्या धूमोपरूद्धदूष्‍टेरपि यजमानस्‍य पावकस्‍यैव मुखे
आहुतिर्निपतिता सुशिष्‍यपरिदत्तेव विद्या अशेचनीयासि में संवृत्ता.
अद्यैव त्‍वाम् ऋषपिरिरक्षितां कृत्‍वा भर्त्तुः सकाशं विसजयामि.'
(अभिज्ञानशाकुंतलम् अंक 4)

अर्थात, है पुत्री, जिस की दृष्टि हवन के धुएं से रूंध गई थी, उस यजमान की भी आहुति (इधर-उधर न पड कर) अग्नि के मुख में ही पडी है. किसी अच्‍छे शिष्‍य को दी हुई विद्या के समान तू मेरे लिए निश्चिंता का कराण बनी है. आज ही मैं तुझ ऋषियों के साथ तेरे पति के पास पहुंचा दूंगा

कण्‍व द्वारा भेजी शकुंतला को राजा दुष्‍यंत पहचानने से ही मना कर देता है, पति द्वारा त्‍यागी हुई वह अकेली औरत वन में रहती है और एक पुत्र को जन्‍म देती है, जिस का नाम भरत था, बहुत वर्षों बाद, बूढा होने पर, राजा उसे अपना लेता है क्‍योंकि उसकी कोई संतान पैदा नहीं हुई थी. इसी इकलौते पुत्र को अपनी जीवन की संध्‍या में अपना लेना एक विवशत थी क्‍योंकि उसे ऐसा कोई चाहिए था जो राज्‍य का उत्तराधिकारी हो, जो उसकी अंत्‍येष्टि करे और उसे श्राद्ध के नाम पर मरणोपरांत पंडों को रसद मुहैया करो, यदि शकुंतला की संतान पुत्री होती तब भी दुष्‍यंत ने उसे मुंह नहीं लगाना था, इस प्रकार भरत को राजसिंहासन पर बैठा कर खुद तप करके परलोक सुधारने के लिए वन को चल देता है, कहते हैं इसी भरत के नाम पर भारत की संस्‍कृति 'भारतीय संस्कृति' है.

साभारः सरिता, अगस्‍त (द्वितीय) 2009 पृष्‍ठ 48

5 comments:

महाशक्ति said...

धर्म की बात सदा जारी रखे, कभी न रोके, जय हिन्‍द

Suresh Chiplunkar said...

राहुल भाई, आप मेरे ब्लॉग पर आये और "भारत रत्न" सम्बन्धी टिप्पणी की उसके लिये धन्यवाद…
जरा अपनी बात खुलकर कहते तो बात आगे बढ़ती… वैसे आपके पिछले दोनों लेख पढ़कर आपके बारे में कोई विचार बनाना मुश्किल है, फ़िर भी सावरकर अथवा मुखर्जी के बारे में कोई तथ्यपरक बात लिखें या फ़िर जो लेख मैंने लिखा है उसमें गाँधी परिवार (कांग्रेस) के बारे में जो लिखा है उसके बारे में अपने तर्क प्रस्तुत करें… ऐसे एक लाइन की हवाई बात करने से मजा नहीं आता भाई…
मेरे ब्लॉग पर बहस में आपका स्वागत है… समस्त शुभकामनाओं सहित…

Anonymous said...

yahi baat yahan bhi bade blogger ne kahi he:

.......महाराज दुष्यंत और शकुन्तला के इस पुत्र का नाम भरत था। बाद में वे भरत महान प्रतापी सम्राट बने और उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष हुआ।
इति कथाः।
क्या यह गंधर्व विवाह "लिव-इन-रिलेशनशिप" नहीं है? यदि है, तो उसे कोसा क्यों जा रहा है? आखिर हमारे देश का नाम उसी संबंध से उत्पन्न व्यक्ति के नाम पर पड़ा है। कैसे कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति को 'लिव-इन-रिलेशनशिप' से खतरा है?.....


दुष्यंत और शंकुन्तला के बीच कौन सा संबंध था?
महाभारत
http://anvarat.blogspot.com/2010/03/blog-post_28.html

Anonymous said...

हर जाति के लिए विवाह का रूप भी अलगअलग हो, ऐसा धर्मशास्‍त्रीय आदेश है, कहा है (मनु. 3/21, 23-24)
ब्राह्मो दैवस्‍तथैवार्ष प्राजापत्‍यस्‍तथा सुरः
गांधर्वो राक्षश्‍चैव पैशाचश्‍चस्‍टामे धम.........राक्षसं क्षत्रियस्‍यैकमासुरं वैश्‍यशुर्दयोः

अर्थात
आठ प्रकार के विवाह हैं
1. ब्राह्मा
2. दैव,
3. आर्ष,
4. प्राजापत्‍य,
5. आसुर (धन से लडकी खरीदना),
6. गांधर्व(अपने तौर पर छिप कर यौन संबंध स्थापित करना),
7. राक्षस(लडकी के घर वालों पर हमला कर के लडकी उठा लाना)
और
8. पैशाच(सोई हुई या बेहोश लडकी से मैथुन करना) -

ब्राह्मण के लिये पहले छ हैं
क्षत्रिय के लिये अन्तिम चार
वैश्‍य और शूद्र के लिये तीन विवाहों का विधान है

उनमें श्रैष्‍ठ विवाह ब्राह्मण के लिये छ मे पहले चार
क्षत्रिय के लिय 'राक्षस'
वैश्‍य और शुद्र के लिए 'आसुर' विवाह श्रेष्‍ठ हैं

irshad said...

matralab itni gandi niti hai vivah ki chiiii